दशावतार व्रत - भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी तिथि
Dashavatara Vrat - Bhadrapada Shukla Paksha Dashami Tithi
॥ श्रीहरिः ॥
दशावतार व्रत - भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी तिथि
भविष्योत्तर पुराण के अनुसार दशावतार व्रत भाद्रपद शुक्ल दशमी को किया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि दशावतार व्रत करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। दशावतार व्रत पर भगवान विष्णु के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, त्रिविक्रम, राम, कृष्ण, परशुराम, बौद्ध और कल्कि' इन दस अवतारों का यथाविधि पूजन पूजा- अर्चना की जाती है।
दशावतार व्रत पूजा विधि -
इस दिन किसी जलाशय पर जाकर स्नान करके देव और पितरों का तर्पण करे। दशावतार पूजन के लिए रोली, अक्षत, दीपक, पुष्प, माला, नारियल, नैवेद्य, कपूर, फल, गंगाजल, यज्ञोपवीत, कलश, तुलसी दल, श्वेत चंदन, हल्दी, पीत एवं श्वेत वस्त्र आदि सामग्री एकत्र करें और अपने हाथ से आटे की लगभग पाँच छटाक आटा लेकर उसके अपूप (पूआ) बनावे।
अब भगवान विष्णु का स्मरण करें। विष्णु जी की मूर्ति के समक्ष दीपक जलाएं। अब सभी सामग्रियों से विष्णु जी का पंचोपचार पूजन करें और 'मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, त्रिविक्रम, राम, कृष्ण, परशुराम, बौद्ध और कल्कि' इन दस अवतारों का यथाविधि पूजन करे और अपूपादि का भोग लगाकर उनमें से दस देवता के, दस ब्राह्मण के और दस अपने रखकर भोजन करे। इस प्रकार दस वर्ष तक करे। १- अपूप, २- घेवर, ३- कासार, ४- मोदक, ५- सुहाल, ६- सकरपारे, ७- डोवठे, ८- गुणा, ९- कोकर और १०- पुष्पकर्ण - इन दस पदार्थों में से प्रतिवर्ष एक-एक पदार्थ देवता आदि को दस-दस की संख्या में अर्पण करे तो विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
दशावतार व्रत के दिन विष्णु मंत्र जाप, विष्णु सहस्रनाम, कीर्तन, स्मरण, दर्शन, विष्णु स्तोत्र आदि का पाठ करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही दशावतार व्रत के दिन विष्णु जी की कथाओं का स्मरण करने का विशेष महत्व है।
